शनिवार, 27 मई 2017

मेरा दर्द फसाना बनकर:-कवि शिव इलाहाबादी(kavi shiv allahabadi:mera dard fasana bankar )

मेरी एक नवीन रचना से कुछ पंक्तियाँ:-

मेरा दर्द फसाना बनकर,
प्रेम कहानी लिख देगा!

लिखा न होगा अब तक जो भी,
ऐसी वाणी लिख देगा !

भटक रहे थे दर-2 कल जो,
आज बने हैं वो राजे !

लेकिन मै हूँ अब भी राही,
राह निशानी लिख देगा !

कवि शिव इलाहाबादी 'यश'
कवि एवं लेखक
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गुरुवार, 25 मई 2017

गुरुदेव नरेन्द्र धड़कन पर लिखी मेरी ये पंक्तियाँ :कवि शिव il

आपको समर्पित मेरी ये पंक्तियाँ :-

उसके चेहरे पर रौब दिखाई देता है !
वो दुश्मन को खुद खौफ दिखाई देता है !
न समता उसकी कभी किसी से हो सकती !
वो सागर है खुद मौज दिखाई देता है !

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अपनो की बेरुखी पर शेर :-कवि शिव इलाहाबादी (Apno par sher:kavi shiv allahabadi )

एक शेर:-

कभी न हारता मै गर वो अपने छोड़ न जाते।
कि उनकी बेरुखी ने मुझको यूँ बर्बाद कर डाला ।।

कवि शिव इलाहाबादी 'यश'
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आरक्षण की राजनीति: इंसानियत की दुश्मन:shiv allahabadi

आरक्षण की राजनीति: इंसानियत की दुश्मन:shiv allahabadi

देश मे चल रही जातिगत आरक्षण रूपी देश और समाज को बाटने वाली साजिश का विरोध करती मेरी ये रचना:

विशेष-किसी भी व्यक्ति की भावना को ठेस पहुँचाना इस रचना का उद्देश्य नही है। यदि किसी भी व्यक्ति को जातिगत आरक्षण से लगाव हो तो कृपया इसे न पढ़े।

क्या आज इंसानियत की सबसे बड़ी दुश्मन
भारत सरकार है?
जो देश को जाति के नाम पर बाँटकर,
करती पलटवार है।

अगर सोंचो,
तो यह साफ नजर आता है।
कि एक तरफ है उपेक्षित झोपड़ी,
और दूसरी तरफ एक सुंदर महल,
तम्बू की शरण पाता है।

आज के नेता उस फूस की झोपड़ी को जलाकर,
तमाशा देख रहे हैं।
और महलों को तम्बू के नीचे ढककर,
राजनीति की रोटी सेक रहे हैं।

उन्होने झोपड़ी और महल को,
जाति के नाम पर बाट रखा है।
और दलित होने के कारण महल को,
अनावश्यक ढाक रखा है।

उन्होने देश मे आरक्षण लगा दिया है,
और जाति के नाम पर लोगों को
संरक्षण दे दिया है।
मगर समझ यह नही आता कि इन सब के पीछे,
सामान्यों का क्या गुनाह है?
जो उनके विरूद्ध ही सारे देश का प्रवाह है।

आज उनकी पढ़ाई वंचित,
और रोटियाँ छीनी जा रही है। 
और इस नाटक के नाम पर देश की,
तरक्की की जा रही है।

क्या देश की तरक्की आरक्षण की गाड़ी पर बैठे,
बुद्धीहीनों से होती है।
जिसे एक पहिये वाली,
भारत सरकार ढोती है।

क्या सामान्यों ने देश को,
स्वतंत्र नही कराया था?
या आजादी की लपटों मे,
खुद को नही जलाया था।

आज देश मे चारो तरफ,
हिंसा की आग जल रही है।
और सरकार महज अपने फायदे के लिए,
घड़ियाली आँसू बहाकर हाथ मल रही है।

क्या महात्मा गांधी ने कोई बड़ा गुनाह किया था?
जो उन्होने रामराज्य का सपना लेकर,
अंग्रेजों से संघर्ष किया था।
लेकिन स्वार्थी तत्वों ने अपने स्वार्थ के लिए,
उनके सपनों को चकनाचूर कर डाला।
और विश्व समुदाय के सामने पूरे विश्व को,
मजबूर कर डाला।
अब तो इस देश रूपी गाड़ी के पहिये भी,
कमजोर दिखने लगे हैं।
जो कभी हुआ करते थे मजबूत आधार स्तंभ,
आज वही स्तंभ ही डिगने लगे हैं।

अब तो इस रामराज्य के सपने को,
राम ही साकार बनाएँ।
खुदा करे कि महात्मा गाँधी एक बार फिर,
इस देश मे आयें।

कवि शिव इलाहाबादी 'यश'
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मंगलवार, 23 मई 2017

सत्ता के दुरुपयोग पर व्यंग:कवि शिव इलाहाबादी(satta ke durupyog aur kalamkaaro ki khamoshi par vyang: Kavi shiv allahabadi )

सत्ता की अनावश्यक हिटलरशाही और तथाकथित कलमकारों की चुप्पी पर व्यंग करती मेरी ये रचना :-

कलम सुहागन बनी हुई है ,
सत्ता के गलियारों की !

चाँदी ही चाँदी दिखती है ,
नेताओं के यारों की !

एक तरफ सैनिक बेचारे,
मारे जाते सीमा पर !

सन्सद बस्ती बनी हुई है ,
कुर्सी के बीमारों की !


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शुक्रवार, 19 मई 2017

प्रेम पर मुक्तक :कवि शिव इलाहाबादी (prem par muktak : Kavi shiv allahabadi )

प्रेम पर लिखा मेरा ये नवीन मुक्तक:

तुम्हारी नींद से बोझिल,
इन्ही आंखो मे आऊँगा !

जगाकर रात भर तुमको,
तेरे सपने सजाऊँगा !

जमाना छीन न ले फिर कहीं,
मुझसे तेरी खुशबू !

सभी से मै चुराकर तुझको,
पलको मे छुपाउँगा !

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शुक्रवार, 12 मई 2017

मुझे अपना बनाने की -कवि शिव इलाहाबादी (mujhe apna banane ki-kavi shiv allahabadi )

मेरी एक नवीन रचना से कुछ पंक्तियाँ:-

मुझे अपना बनाने की ,
कसम खा के तो देखा कर !

कि जब भी हो अकेला तू ,
जरा मुसका के देखा कर !

जमाने की सभी उलझन,
तू यूँ ही भूल जायेगा !

जो दुनिया रूठ जाये तो ,
मुझे अपना के देखा कर !

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शुक्रवार, 5 मई 2017

बचपन पर कविता :कवि शिव इलाहाबादी(bachpan par kavita : Kavi shiv allahabadi )

अपने भांजे के इस अल्हड़ अन्दाज को देखकर अनायास ही ये पंक्तियाँ दिमाग में आ गयी :-

मासूमी अन्दाज बताता,
बचपन एक कहानी लिख दूँ !
खेल,खिलौने,बात में झगडे,
मैं आंखो का पानी लिख दूँ !

खुशियों का संसार समेटे,
चिंतारहित निशानी लिख दूँ !
न कोई झूठ ,न ही कोई ईर्ष्या ,
इसे ईश्वर की वाणी लिख दूँ !


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बुधवार, 3 मई 2017

पाकिस्तानियो द्वारा भारतीय सैनिकों के सर काटे जाने पर सरकार को अपनी बातें याद दिलाती मेरी ये रचना !

वर्तमान सरकार को अपनी पुरानी कही हुई बातों को याद दिलाती मेरी ये नवीन रचना :-

कहाँ है आज वो ललकार
जो कल तक थी जोरों से !
हैं दिखती चीख अब दबती हुई सी
आज शोरों से !

तुम्ही ने कल कहा था सर कलम
करने को दुश्मन के ,
तो फिर अब क्यों ठगे से हो खडे
चोरों छिछोरों से ?

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सोमवार, 1 मई 2017

मजदूर पर लिखी कविता

मजदूर दिवस के मौके पर मेरे लेखन के प्रारम्भिक काल मे मजदूर की संवेदनाओं को अभिव्यक्त करते हुए लिखी मेरी ये रचना:-


मै
मज़दूर हूँ।
दर्द से कराहते
निज दिल की व्यथाओं से
चूर हूँ।
मैं
मजदूर हूँ।

रोता हूँ, चिल्लाता हूँ।
गम के गीत
गाता हूँ।
मन है मेरा सहमा सा,
क्योकि मैं
बेकसूर हूँ।
मैं
मजदूर हूँ।

सुबह थकाती,शाम थकाती,
दुनिया हम पर रौब दिखाती।
इस दुनिया की सब रस्मों से,
मै तो कोशों दूर हूँ।
मैं
मजदूर हूँ।

कोई चढ़ता घोड़ा-गाड़ी,
स्कूटर कोई करे सवारी।
कोई करता हवा-हवाई,
लेकिन मै मजबूर हूँ।
मैं मजदूर हूँ।

मेरा एक दुपहिया वाहन,
जेठ,कुवार हो या फिर सावन।
हर मौसम मे वही है अपना,
हर सुविधा से दूर हूँ।
मैं
मजदूर हूँ।

कवि शिव इलाहाबादी यश
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शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

सेना के जवानो पर आतंकवादी प्रहार के परिणामस्वरूप मेरी ये पंक्तियां


नक्सलवादियों द्वारा सीआरपीएफ़ जवानो के ऊपर किए गए कायराना हमले से व्यथित होने पर मेरे प्रतिक्रिया स्वरूप लिखी मेरी ये पंक्तियाँ:-

अब मैं अश्के नीर लिखूंगा,
भारत की तस्वीर लिखूंगा।
तड़प रही उस माँ की ममता,
पत्नी का सिंदूर लिखूंगा।

जख्मी वीर के दिल की बीती,
घायल का हर पीर लिखूंगा।
मर  मिटता है वतन पे अपने जो,
अब मैं हर वो वीर लिखूंगा।

एक विधवा का दर्द सुनाता,
पितृहीन तकदीर लिखूंगा।
त्याग के सब कुछ डटा हुआ मै,
अब सीमा पर वीर लिखूंगा।



कवि शिव इलाहाबादी 'यश'
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बुधवार, 26 अप्रैल 2017

Images of poems :kavi shiv allahabadi (कविता की फोटो :कवि शिव इलाहाबादी )

आरक्षण पर लिखी मेरी कविता :कवि शिव इलाहाबादी(arakshan par likhi meri kavita:kavi shiv allahabadi

आरक्षण पर प्रहार करता मेरा ये व्यंग्य:-

उगता सूरज ढलते देखा,
हमने तो रण मे वीरों को भी,
कायर सा चलते देखा,
उगता सूरज ढलते देखा।

हो गया ये रोशन जग सारा,
फिर भी न मिला कोई न्यारा,
जो बुझा सके इस अगनी को,
जिसे दुनिया मे जलते देखा।
उगता सूरज.........................

हर जगह है भ्रष्टाचार यहाँ,
है कत्ल, समस्या यहाँ,वहाँ।
जो शांत समंदर था एक दिन,
उसमे भी अनल जलते देखा।
उगता सूरज.........................

हर जगह जाती का परदा है,
इसमे जिंदा बना मुर्दा है।
इस जातिवाद की अग्नी मे,
परवानो को जलते देखा।
उगता सूरज ................

जीवन मे कोई सीख नहीं,
भूखे को कोई भीख नहीं।
इस जग की विषम परिस्थिति मे,
मुरदो को भी चलते देखा।
उगता सूरज....................

हर तरफ तो अब हरियाली है,
हर गाँव मे ही खुशियाली है।
लेकिन दुख है तो ‘यश’ इतना,
की जिंदों को जलते देखा।
उगता सूरज.....................
                                                                    शिव पाण्डेय ’यश’
(कवि एवं लेखक)
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आरक्षण पर लिखी मेरी कविता :कवि शिव इलाहाबादी(arakshan par likhi meri kavita:kavi shiv allahabadi

आरक्षण पर प्रहार करता मेरा ये व्यंग्य:-

उगता सूरज ढलते देखा,
हमने तो रण मे वीरों को भी,
कायर सा चलते देखा,
उगता सूरज ढलते देखा।

हो गया ये रोशन जग सारा,
फिर भी न मिला कोई न्यारा,
जो बुझा सके इस अगनी को,
जिसे दुनिया मे जलते देखा।
उगता सूरज.........................

हर जगह है भ्रष्टाचार यहाँ,
है कत्ल, समस्या यहाँ,वहाँ।
जो शांत समंदर था एक दिन,
उसमे भी अनल जलते देखा।
उगता सूरज.........................

हर जगह जाती का परदा है,
इसमे जिंदा बना मुर्दा है।
इस जातिवाद की अग्नी मे,
परवानो को जलते देखा।
उगता सूरज ................

जीवन मे कोई सीख नहीं,
भूखे को कोई भीख नहीं।
इस जग की विषम परिस्थिति मे,
मुरदो को भी चलते देखा।
उगता सूरज....................

हर तरफ तो अब हरियाली है,
हर गाँव मे ही खुशियाली है।
लेकिन दुख है तो ‘यश’ इतना,
की जिंदों को जलते देखा।
उगता सूरज.....................
                                                            शिव पाण्डेय ’यश’
                                                             (कवि एवं लेखक)
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मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

प्यार की गहराई पर लिखी मेरी रचना :-

चाहत की अपार गहराई को बयाँ करती मेरी ये नवीन रचना:-

तूफानों से भी टकराने का जज्बा रखता है।
वो समंदर है अपने सीने मे दरिया रखता है।
तुम मुझे गैर भी समझो तो कोई बात नहीं।
वो मुझे अपने मे समेट लेने की चाहत रखता है।

कवि शिव इलाहाबादी 'यश'
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चाहत की अपार गहराई को बयाँ करती मेरी ये नवीन रचना:-

तूफानों से भी टकराने का जज्बा रखता है।
वो समंदर है अपने सीने मे दरिया रखता है।
तुम मुझे गैर भी समझो तो कोई बात नहीं।
वो मुझे अपने मे समेट लेने की चाहत रखता है।

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