शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

सेना के जवानो पर आतंकवादी प्रहार के परिणामस्वरूप मेरी ये पंक्तियां


नक्सलवादियों द्वारा सीआरपीएफ़ जवानो के ऊपर किए गए कायराना हमले से व्यथित होने पर मेरे प्रतिक्रिया स्वरूप लिखी मेरी ये पंक्तियाँ:-

अब मैं अश्के नीर लिखूंगा,
भारत की तस्वीर लिखूंगा।
तड़प रही उस माँ की ममता,
पत्नी का सिंदूर लिखूंगा।

जख्मी वीर के दिल की बीती,
घायल का हर पीर लिखूंगा।
मर  मिटता है वतन पे अपने जो,
अब मैं हर वो वीर लिखूंगा।

एक विधवा का दर्द सुनाता,
पितृहीन तकदीर लिखूंगा।
त्याग के सब कुछ डटा हुआ मै,
अब सीमा पर वीर लिखूंगा।



कवि शिव इलाहाबादी 'यश'
कवि एवं लेखक
मो.-7398328084
All Rights Reserved@kavishivallahabadi
ब्लॉग-www.kavishivallahabadi.blogspot.com


बुधवार, 26 अप्रैल 2017

Images of poems :kavi shiv allahabadi (कविता की फोटो :कवि शिव इलाहाबादी )

आरक्षण पर लिखी मेरी कविता :कवि शिव इलाहाबादी(arakshan par likhi meri kavita:kavi shiv allahabadi

आरक्षण पर प्रहार करता मेरा ये व्यंग्य:-

उगता सूरज ढलते देखा,
हमने तो रण मे वीरों को भी,
कायर सा चलते देखा,
उगता सूरज ढलते देखा।

हो गया ये रोशन जग सारा,
फिर भी न मिला कोई न्यारा,
जो बुझा सके इस अगनी को,
जिसे दुनिया मे जलते देखा।
उगता सूरज.........................

हर जगह है भ्रष्टाचार यहाँ,
है कत्ल, समस्या यहाँ,वहाँ।
जो शांत समंदर था एक दिन,
उसमे भी अनल जलते देखा।
उगता सूरज.........................

हर जगह जाती का परदा है,
इसमे जिंदा बना मुर्दा है।
इस जातिवाद की अग्नी मे,
परवानो को जलते देखा।
उगता सूरज ................

जीवन मे कोई सीख नहीं,
भूखे को कोई भीख नहीं।
इस जग की विषम परिस्थिति मे,
मुरदो को भी चलते देखा।
उगता सूरज....................

हर तरफ तो अब हरियाली है,
हर गाँव मे ही खुशियाली है।
लेकिन दुख है तो ‘यश’ इतना,
की जिंदों को जलते देखा।
उगता सूरज.....................
                                                                    शिव पाण्डेय ’यश’
(कवि एवं लेखक)
Mob-7398328084
All Rights Reserved@kavishivallahabadi
Blog-kavishivallahabadi.blogspot.com

आरक्षण पर लिखी मेरी कविता :कवि शिव इलाहाबादी(arakshan par likhi meri kavita:kavi shiv allahabadi

आरक्षण पर प्रहार करता मेरा ये व्यंग्य:-

उगता सूरज ढलते देखा,
हमने तो रण मे वीरों को भी,
कायर सा चलते देखा,
उगता सूरज ढलते देखा।

हो गया ये रोशन जग सारा,
फिर भी न मिला कोई न्यारा,
जो बुझा सके इस अगनी को,
जिसे दुनिया मे जलते देखा।
उगता सूरज.........................

हर जगह है भ्रष्टाचार यहाँ,
है कत्ल, समस्या यहाँ,वहाँ।
जो शांत समंदर था एक दिन,
उसमे भी अनल जलते देखा।
उगता सूरज.........................

हर जगह जाती का परदा है,
इसमे जिंदा बना मुर्दा है।
इस जातिवाद की अग्नी मे,
परवानो को जलते देखा।
उगता सूरज ................

जीवन मे कोई सीख नहीं,
भूखे को कोई भीख नहीं।
इस जग की विषम परिस्थिति मे,
मुरदो को भी चलते देखा।
उगता सूरज....................

हर तरफ तो अब हरियाली है,
हर गाँव मे ही खुशियाली है।
लेकिन दुख है तो ‘यश’ इतना,
की जिंदों को जलते देखा।
उगता सूरज.....................
                                                            शिव पाण्डेय ’यश’
                                                             (कवि एवं लेखक)
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मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

प्यार की गहराई पर लिखी मेरी रचना :-

चाहत की अपार गहराई को बयाँ करती मेरी ये नवीन रचना:-

तूफानों से भी टकराने का जज्बा रखता है।
वो समंदर है अपने सीने मे दरिया रखता है।
तुम मुझे गैर भी समझो तो कोई बात नहीं।
वो मुझे अपने मे समेट लेने की चाहत रखता है।

कवि शिव इलाहाबादी 'यश'
कवि एवं लेखक
मो.-7398328084
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ब्लॉग-www.kavishivallahabadi.blogspot.com

चाहत की अपार गहराई को बयाँ करती मेरी ये नवीन रचना:-

तूफानों से भी टकराने का जज्बा रखता है।
वो समंदर है अपने सीने मे दरिया रखता है।
तुम मुझे गैर भी समझो तो कोई बात नहीं।
वो मुझे अपने मे समेट लेने की चाहत रखता है।

कवि शिव इलाहाबादी 'यश'
कवि एवं लेखक
मो.-7398328084
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शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

सैनिको पर पत्थरबाजी -कवि शिव इलाहाबादी (sainiko par pattharbaji:kavi shiv allahabadi )


सैनिकों पर पत्थरबाजी की घटना:कवि शिव इलाहाबादी(sainko par pattharbaji:- kavi shiv allahabadi)

दो कौडी के पत्थरबाजों द्वारा सैनिकों को लातों से पीटने पर नेताओं की कोरी बयानबाजी पर अपनी विरोध प्रतिक्रिया दर्ज कराती मेरी ये रचना:-


कहाँ गये जो छप्पन इंच का
सीना तान के चलते थे !
कहाँ गये वो जिनको देख के
दुश्मन राह बदलते थे !

ये वो थे जो पहले भारत
माँ को सब कुछ कहते थे !
कोई आंख उठाये तनकर,
तो ये चुप न रहते थे !

लेकिन उनकी कहाँ गयी,
वो खुद्दारी जो दिखती थी!
वो नीयत जो राष्ट्रप्रेम थी,
और कभी न बिकती थी !

लेकिन सत्ता के किस मद ने,
तुमको कायर कर डाला!
छप्पन इंच के सीने को ही,
जिसने घायल कर डाला !

आखिर क्या थी मजबूरी वो,
जिसने तुमको झुका दिया !
था विशाल जो कभी हिमालय,
उसको बौना बना दिया !

क्यो तुमनें सेना के हाथों,
प्लास्टिक की गन दे डाली,
क्यों जूते मरवाया उसको,
जिसने की थी रखवाली !

जूतों से उसको मरवाया,
क्या ये अच्छा काम किया ?
भारत माँ की इज्जत को,
यूँ दुनिया मे बदनाम किया !

रक्षक लात से पीटा जाये,
तो ये छोटी बात नही !
कोई आंख उठाये उनपर,
इतनी तो औकात नही !

लेकिन नियम तुम्हारे ऐसे,
कि उनको मजबूर किया !
भारत माँ की सेवा के,
सपनो को चकनाचूर किया !

काश के तुम उनके भावों को,
दिल से कभी समझ पाते!
देकर खुली छूट सैनिक को,
उनके दिल को पढ पाते !

बँधे हाथ गर खुल जायें
तो हर सैनिक आफत होगा !
पत्थर बाज न राह दिखेंगे,
घाटी में भारत होगा !

कवि शिव इलाहाबादी 'यश'
कवि एवं लेखक
मो.- 7398328084
©All Rights Reserved@kavishivallahabadi


सोमवार, 17 अप्रैल 2017

नारी उत्थान की कविता- कवि शिव इलाहाबादी(nari utthan ki kavita :kavi shiv allahabadi )


नारी उत्थान का समर्थन करती मेरी ये रचना

नारी उत्थान का समर्थन करती मेरी ये पंक्तियाँ:-

लड़कियों को भी ये अब अधिकार होना चाहिए।
उनको अपनी सोंच का हकदार होना चाहिए।

ज़िंदगी की जो कमी, न दूर हो किसी मोड पर
उनको भी उस राह का सहकार होना चाहिए।

पर्दे की मूरत बनाकर न रखा जाए उन्हे,
ज़िंदगी की जंग से दो चार होना चाहिए।

लोग बदलेंगे के जब यश खुद मे ही वो चाह हो।
रूढ़िवादी सोंच को इनकार होना चाहिए।


शिव इलाहाबादी यश
कवि एवं लेखक 
mob-7398328084