गुरुवार, 20 मई 2021

प्रेम के गीत | मोहब्बत के बीच गीत | पुरानी यादों पर गीत | बिछड़ी हुई मोहब्बत के गीत | उलझ गई सी है ये जिंदगी हमारी है |


उलझ गई सी है ये जिंदगी हमारी है,
तुम्हारी याद में राते कई गुजारे हैं |

पुराने गांव को खेतों को छोड़ आए हम,

नदी की धार को रेतों को छोड़ आए हम |

शमा ने आंधियों से आज कर ली यारी है,
तुम्हारी याद में राते कई गुजारी है |



नहीं हो तुम तो ये शामे उदास लगती हैं,
चमकती रातें भी अब तो न खास लगती हैं |
मिलन के रात की छाई वही खुमारी है,
तुम्हारी याद में राते कई गुजारी हैं


उलझ गई सी है ये जिंदगी हमारी है,
तुम्हारी याद में राते कई गुजारे हैं |




 इस गीत को यूट्यूब पर देखने के लिए इसे क्लिक करें


प्रेम और एहसास का गीत | जीवन का संगीत |

शब्द-शब्द के मोती चुन कर,

तेरे खातिर गीत लिखे हैं |

महक रही मन की फुलवारी,

जीवन का संगीत लिखे हैं |



अक्षर अक्षर दीप जलाकर,

 इस सुर का संधान किया है |

जीवन के इस महाग्रंथ का,

हमने तुमको दान किया है |


अपने दिल के एहसासों से,

तेरे दिल की प्रीत लिखे हैं |

वह कर ही मन की फुलवारी,

जीवन का संगीत लिखे हैं |


नफरत की मंजर फायदे हैं,

अब हर और उदासी है |

प्रेम का दरिया सिकुड़ गया है,

आंखें प्यासी प्यासी हैं  |


प्रतिशोधो की अग्नि बुझा कर, 

दिल की दिल से जीत लिखे हैं |

महक रहिमन की फुलवारी,

जीवन का संगीत लिखे हैं |


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शुक्रवार, 14 मई 2021

जीवन में संतुलन बहुत जरूरी है |



एक नाव बीच नदी में डूब गई, शिकायत राजा तक आई... राजा के दरबार में पेशी हुई

राजा ने नाविक से पूछा – नाव कैसे डूबी?

राजा  :  क्या नाव में छेद था?

नाविक  – नहीं महाराज, नाव बिल्कुल दुरुस्त थी!

राजा – क्या तुमने सवारी अधिक बिठाई?

नाविक – नहीं महाराज, सवारी नाव की क्षमतानुसार ही थे और न जाने कितनी बार मैंने उससे अधिक सवारी बिठाकर  भी नाव पार लगाई है!

राजा – आँधी, तूफान जैसी कोई प्राकृतिक आपदा भी तो नहीं थी न?

नाविक – मौसम सुहाना तथा नदी भी बिल्कुल शान्त थी महाराज!

राजा – कहीं मदिरा पान तो नहीं किया था तुमने?

नाविक – नहीं महाराज, आप चाहें तो इन लोगों से पूछ कर संतुष्ट हो सकते हैं यह लोग भी मेरे साथ तैरकर जीवित लौटे हैं!

महाराज– फिर, क्या चूक हुई? कैसे हुई इतनी बड़ी दुर्घटना?

नाविक – महाराज, नाव हौले-हौले, बिना हिलकोरे लिये नदी में चल रही थी. तभी नाव में बैठे एक आदमी ने नाव के भीतर ही थूक दिया!

मैंने पतवार रोक के उसका विरोध किया और पूछा कि भाई *"तुमने नाव के भीतर क्यों थूका?"

उसने उपहास में कहा – "क्या मेरे नाव में थूकने से ये नाव डूब जायेगी?"

मैंने कहा – "नाव तो नहीं डूबेगी लेकिन तुम्हारे इस निकृष्ट कार्य से हमें घिन आ रही है, बताओ, जो नाव तुमको अपने सीने पर बिठाकर इस पार से उस पार ले जा रही है तुम उसी में क्यों थूक रहे हो??

राजा – फिर?

नाविक – महाराज मेरी इतनी बात पर वो तुनक गया, बोला पैसा देते हैं नदी पार करने के. कोई एहसान नहीं कर रहे तुम और तुम्हारी नाव.

राजा (विस्मय के साथ) – पैसा देने का क्या मतलब, साला नाव में थूकेगा क्या? अच्छा, फिर क्या हुआ?

नाविक – महाराज वो मुझसे झगड़ा करने लगा.

राजा – नाव में बैठे और लोग क्या कर रहे थे? क्या उन लोगों ने उसका विरोध नहीं किया?

नाविक – हाँ, नाव के बहुत से लोग मेरे साथ उसका विरोध करने लगे!



राजा – तब तो उसका मनोबल टूटा होगा, उसको अपनी गलती का एहसास हुआ होगा?

नाविक – ऐसा नहीं था महाराज, नाव में कुछ लोग ऐसे भी थे जो उसके साथ उसके पक्ष में खड़े हो गये ...  नाव के भीतर ही दो खेमे बँट गये,  बीच मझधार में ही यात्री आपस में उलझ पड़े...

राजा – चलती नाव में ही मारपीट,  तुमने उन्हें समझाया तथा रोका नहीं?...

नाविक– रोका महाराज, हाथ जोड़कर विनती भी की, मैने कहा – नाव इस वक्त अपने नाजुक दौर में है, इस वक्त नाव में तनिक भी हलचल हम सबकी जान का खतरा बन जायेगी  लेकिन वो नहीं माने, सब एक दूसरे पर टूट पड़े तथा नाव ने बीच गहरी धारा में ही संतुलन खो दिया महाराज...

कहानी का सार

 जीवन में संतुलन बहुत जरूरी है |

Source-Whatsapp and social media

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मंगलवार, 11 मई 2021

प्रेम और बेवफाई की गजल || मेरे दिल की दुआ तुम तक पहुंच जाती तो अच्छा था ||

वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके अथवा उसको कॉपी करके यूट्यूब पर सर्च करके देखें l

https://youtu.be/GYDfXR97Lw4




मेरे दिल की सदा तुम तक पहुंच जाती तो अच्छा था,
जो वादा था किया तुमने निभा पाती तो अच्छा था l
बहुत सी प्यार की यादें भी घिरी है अब सवालों में,
अगर तुम आके उन सबको मिटा जाती तो अच्छा था l

बहुत सपने सजाए थे कभी हमने वफाओं के,
तुम्हारी ही खुमारी थी,तुम ही थे अपनी बाहों में l
मगर अब दोस्त भी वो ही भुला बैठा जो सच्चा था,
मेरे दिल की सदा तुम तक पहुंच जाती तो अच्छा था l

जमाने की ये महफिल थी मगर सब नज्म तेरे थे,
तुम्हारी ही थी सैदाई महज अंदाज मेरे थे l
मेरे हर रंग फीके हैं तू भर जाती तो अच्छा था,
मेरे दिल की सदा तुम तक पहुंच जाती तो अच्छा था l

नहीं शहनाइया बजती है अब दिल के ख्यालों में
तसल्ली ढूंढता है मन वफाओं के सवालों में l
के आकर फिर हिकारत तू दिखा जाती तो अच्छा था,
मेरे दिल की सदा तुम तक पहुंच जाती तो अच्छा था l

कवि शिव इलाहाबादी
मोबा.-7398328084

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