शनिवार, 19 मई 2018

आबों में कड़वाहट क्यों है, क्यों पुष्प पंखुड़ी बिखरी सी


आबों में कड़वाहट क्यों है ,क्यों पुष्प पंखुड़ी  बिखरी  सी ,
क्यों आज कली है मुरझाई  जो कल होती थी निखरी  सी !

क्यों माला से मोती टूटे, क्यों वन से उपवन टूट गए !
जो कल तक होते थे अपने क्यों अपनों से ही रूठ गए ?

क्यों दुनिया चाँद सितारों की तूफ़ान के जद में बिखर गयी !
क्यों जातिवाद की लपटों में सब मर्यादायें सिहर गयी !

क्या बचा धर्म के झगडे में ,क्या रखा है कड़वी वाणी में ?
क्या तुमने धर्म लिखा पाया है हवा वनस्पति पानी में ?

क्यों बाँट  रहे हो नफरत  तुम क्यों लहूं बहाते फिरते  हो
जीवन की चंद सी साँसों को क्यों व्यर्थ गंवाते फिरते हो !

आओ कुछ ऐसा काम करें की अपनेपन में खो जाएँ ,
सबकी मर्यादा को samjhe और एक दूजे के हो जाएँ  !

कुछ ऐसा गीत लिखें मिल हम कि जीवन मधुरिम हो जाए,
हम विश्व शांति के दूत  बने और शांति निशा में खो जाएँ  !

जीवन को मधुर बनाने को सात्विक  अरमान जरूरी है !
हो विश्व शांतिमय  युगों  युगों, एक हिंदुस्तान जरूरी है !

शिव इलाहाबादी
मोब.7398328084




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