रविवार, 24 सितंबर 2017

सम्भले सम्भले कदम फिर

एक शेर आपके हवाले   :-

सम्भले- सम्भले   कदम फिर बहकने लगे ,
दिल के भीतर परिंदे चहकने लगे !
वो बहारों  को मौसम  बताने  लगी ,
उनकी खुशबू  से हम भी महकने  लगे !

कवि शिव इलाहाबादी
कवि एवं लेखक
मोब.7398328084
ब्लॉग www.kavishivallahabadi.blogspot.com
All rights reserved@kavishivallahabadi




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें